Tuesday, 11 April 2017

Universities Act proves to be a toothless legislation, Without Enabling Statutes

The implementation of much awaited 'Universities Act' is proving to be cumbersome, Because State Government has not constituted the Statutes governing the ground work, ensuring the smooth working of the Act. 

Maharashtra Public Universities Act has already come in to force from 1st March 2017. It's revel in a query filed by RTI Activist Anil Galgali.

"Every day working of 11 Universities across Maharashtra has been affected and work has almost come to a standstill'.

Through an RTI query, Anil Galgali exposed how Maharashtra Government hurriedly implemented the Act, But conveniently forgot to constitute the committees under the Act. The process of formation of Statutes is underway, Galgali was told by Under Secretary and Public Information Officer of Higher and Technical Education Satish Mali.

This makes mockery of legislation crafted over the years on suggestions of three high powered committees. Dr Anil Kakodkar Committee, Dr Arun Nigvekar Committee and Dr Ram Takawale Committee were set up in 2010-11 to suggest changes in age-old Universities Act, With the purpose of empowering the Universities and strenghening the internal mechanisms, Enabling them to face global challenges. The first draft of the Universities Bill was tabled before Maharashtra Legislature in April 2016. A joint Committee of 21 members of State Assembly & Council was constituted to  suggest amendments to this important Act. This Committee took 10 meeting to further fine-tune the Bill. It was only after this enormous exercise that 'Maharastra Public Universities Bill' was unanimously passed by both the houses of Maharashtra Legislature in December 2016.

Now Anil Galgali has written to State Governor, Who incidently is also the Chancellor of the Universities, seeking his intervention. Galgali has requested that the Governor instruct the Government to ensure that the Statutes are in place, Before the legislation is actually enforced.

Sunday, 9 April 2017

शिर्के ने खड़ी की अवैध बिल्डिंग,म्हाडा ने अदा किए 19 करोड़

मुंबई मनपा की अनुमति लिए बिना मेसर्स शिर्के कंपनी ने कालीना में आला अफसरों की 'मैत्री' बिल्डिंग में किया हुआ अवैध निर्माण चर्चा में हैं। म्हाडाने मनपा की अनुमति के बिना बनाए अवैध निर्माण पर हुए खर्च की 94 प्रतिशत रकम शिर्के को अदा करने का नया खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली को दी नई जानकारी से हुआ हैं। म्हाडा ने शिर्के को 18 करोड़ 83 लाख 80 रुपए अदा किए हैं।

म्हाडा मुंबई मंडल की विभागीय लेखपाल ने अनिल गलगली ने पूछी जानकारी के जबाब में बताया कि उच्च आय वर्ग के 72 मकानों की बिल्डिंग पर 31 मार्च 2017 तक 20 करोड़ 14 लाख 78 रुपए खर्च हुए हैं। म्हाडा ने 31 मार्च 2017 मेसर्स बी जी शिर्के कंपनी को 18 करोड़ 83 लाख 80 रुपए अदा किए हैं। 

अनिल गलगली ने म्हाडा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि अवैध निर्माण पर हुए खर्च की रकम अदा करने के पहले मनपा की अनुमति जांचने की आवश्यकता थी जिसे नजरअंदाज किया है। मनपा इस अवैध निर्माण को तोड़ेगी तो जो करोड़ों का भुगतान किया गया हैं उसे शिर्के से वसूलना आसान नहीं होगा।

म्हाडा प्रशासन ने अनिल गलगली को बताया कि मेसर्स बी जी शिर्के कंपनी को  2 मार्च 2017 को नोटीस जारी कर अवैध निर्माण पर खुलासा 7 दिन के भीतर करने का आदेश दिया गया हैं।  म्हाडा ने मैत्री सहकारी गृहनिर्माण संस्था में तय 76 सदस्य के अलावा शेष और सरकार ने मंजूर किए सदस्यों के लिए 15 फ्लैट उपलब्ध कराने के लिए मंजूरी दी।  विंग ए के लिए 3 और विंग बी तथा सी के लिए 2 फ्लोर की अनुमति होते हुए मेसर्स शिर्के इस ठेकेदार ने 12 फ्लोर का निर्माण किया और उसके बाद अवैध निर्माण को अधिकृत करने का अनुरोध किया हैं।

मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर उपमुख्यमंत्री कार्यालय, म्हाडा, एसआरए, गृहनिर्माण, ग्रामविकास, नगरविकास, सहकार,राजस्व, भ्रष्टाचार निरोधक ब्युरो, सार्वजनिक स्वास्थ्य, मनपा, सिडको, शिक्षा, जलसंपदा, कृषी, महिला व बालविकास, उद्योग, सूचना व तकनीक, पुलिस, विक्रीकर, यातायात ऐसे हर एक विभाग का अफसर और कर्मचारी को फ्लैट मिलेगा। 4 प्रमोटर में मुंबई मंडल के सहमुख्य अधिकारी अभिमन्यू काले, पुलिस उपायुक्त सुनील रामानंद, गृहनिर्माण राज्यमंत्री के निजी खाजगी सचिव कैलास पगारे आउट गृहनिर्माण विभाग के उपसचिव एवं अप्पर जिलाधिकारी दिलीप शिंदे हैं वहीं चीफ प्रमोटर झोपडपट्टी पुनर्वास प्राधिकरण के अप्पर जिलाधिकारी ए.एम.वजरकर हैं।

शिर्केने उभारली अनधिकृत इमारत, म्हाडाने अदा केले 19 कोटी

मुंबई पालिकेची परवानगी न घेता मेसर्स शिर्के कंपनीने कालीना येथील म्हाडाच्या जमिनीवर ज्येष्ठ सनदी अधिका-यांची 'मैत्री' इमारतीत केलेले अनधिकृत बांधकाम चर्चेचा विषय आहे. म्हाडाने पालिकेची परवानगी न घेत बांधलेल्या अनधिकृत इमारतीवर झालेल्या एकूण खर्चाची 94 प्रतिशत रक्कम शिर्के कंपनीला अदा केल्याचा नवीन खुलासा आरटीआय कार्यकर्ते अनिल गलगली यांस दिलेल्या माहितीमुळे झाला आहे. म्हाडाने शिर्के कंपनीला 18 कोटी 83 लाख 80 रुपये अदा केले आहे.

म्हाडा मुंबई मंडळाच्या विभागीय लेखापाल यांनी अनिल गलगली यांस विचारलेल्या माहितीबाबत कळविले की उच्च उत्पन्न वर्गाच्या 72 घरांसाठी 31 मार्च 2017 पर्यंत 20 कोटी 14 लाख 78 रुपये झाले आहे. म्हाडाने 31 मार्च 2017 पर्यंत मेसर्स बी जी शिर्के कंपनीला 18 कोटी 83 लाख 80 रुपये अदा केले आहे.

अनिल गलगलीे यांनी म्हाडाच्या कार्यप्रणालीवर प्रश्नचिन्ह करत चिंता व्यक्त केली की अनधिकृत बांधकामावर खर्च केलेली रक्कम देण्यापूर्वी पालिकेच्या परवानगीची शहानिशा करण्याची आवश्यकता होती ज्याकडे म्हाडाने दुर्लक्ष केले आहे. पालिकेने सदर अनधिकृत बांधकाम तोडल्यास कोटयावधीची दिलेली रक्कम परत शिर्केकडून वसूल करणे शक्य होणार नाही.

म्हाडा प्रशासनाने अनिल गलगली यांस कळविले होते  की मेसर्स बी जी शिर्के कंपनीस 2 मार्च 2017 रोजी नोटीस जारी करुन अनधिकृत बांधकामाबाबत खुलासा 7 दिवसाच्या आत करण्याचे आदेश देण्यात आले आहेत. म्हाडाने मैत्री सहकारी गृहनिर्माण संस्थेतील निर्धारित 76 सदस्यांव्यतिरिक्त उर्वरित तसेच शासनाने मंजूर केलेल्या सदस्यांकरिता 15 सदनिका उपलब्ध करून देण्यास मंजूरी देण्यात आली. विंग ए साठी 3 तर विंग बी आणि सी साठी 2 माळयाची परवानगी असताना मेसर्स शिर्के या कंत्राटदाराने प्रत्येकी विंगमध्ये 12 माळयाचे बांधकाम केले आणि त्यानंतर सर्व विंगचे मिळून 29 अनधिकृत माळे अधिकृत करण्याची विनंती पालिकेस केली.

मुख्यमंत्री सचिवालयापासून उपमुख्यमंत्री कार्यालय, म्हाडा, एसआरए, गृहनिर्माण, ग्रामविकास, नगरविकास, सहकार, महसूल, भ्रष्टाचार निरोधक ब्युरो, सार्वजनिक आरोग्य , पालिका, सिडको, शिक्षण, जलसंपदा, कृषी, महिला व बालविकास, उद्योग, माहिती व तंत्रज्ञान, पोलीस, विक्रीकर, परिवहन अश्या प्रत्येक खात्याच्या अधिकारी आणि कर्मचा-यांची वर्णी लागली असून 4 प्रर्वतकामध्ये मुंबई मंडळाचे सहमुख्य अधिकारी अभिमन्यू काळे, पोलीस उपायुक्त सुनील रामानंद, गृहनिर्माण राज्यमंत्र्यांचे खाजगी सचिव कैलास पगारे आणि गृहनिर्माण विभागाचे उपसचिव व अप्पर जिल्हाधिकारी दिलीप शिंदे आहेत तर मुख्य प्रर्वतक झोपडपट्टी पुनवर्सन प्राधिकरणाचे अप्पर जिल्हाधिकारी ए.एम.वझरकर आहेत. 

Shirke built illegal building, MHADA paid 19 crores

M/s Shirke Company has constructed an illegal building "Maitri" at Kalina for high ranking officers without BMC permission which has become the latest talk of the town. MHADA has already paid to M/s Shirke  94% cost of the illegal building constructed without  BMC approval  at kalina for top ranking officers. This was revealed in a query put by RTI Activist Anil Galgali. Shirke Company has been paid 18 crores 83 lakh & 80 rupees so far.

The Regional Auditor of MHADA Mumbai,in his reply to Anil Galgali 's query has informed that that upto 31 march 2017 the total expenditure of high income group 72 houses has been 20 crores 14 lacs 78 Rupees so far. Shirke Company has been paid 18 crores 83 lakh & 80 rupees so far.

Anil Galgali questioned the work Ethics of Mhada wherein it was necessary to make inquiries  before making the payments  for an illegal construction. It was totally overlooked. If the Bmc demolishes the illegal construction the cost of which runs into crores, will it be possible to retrieve this amount from Shirke.

Eariler Mhada Authority informed Anil Galgali that they issue Notice to Contractor Shirke and ask clarification within 7 days. In a shocking case of misuse of power, 29 illegal floors have been added to construct a 12 floor high-rise building in Kalina, Santacruz-East to provide houses to top bureaucrats of Maharashtra. RTI Activist Anil Galgali has exposed this case, Where the building has incidentally been named 'Maitri' (Friendship), Signifying the alliance between the powerful 'Babus of Mantralaya' and one of the biggest contractor of Maharashtra Ms. B.G. Shirke, Who has been given the task of construction. 84 allottees of the building are Government Servants and include Chief Minister's Secretary Pravin Darade, Bipin Shrimali, Harshdeep Kamble, Sudhir Thackeray, Abhimanyu Kale, Deepak Kapoor, Rajesh Narvekar and Jawahar Singh.

The 84 allottees of the building include officials from CM office, Deputy CM office, MHADA, SRA, Housing, Rural Development, Urban Development, Cooperative, Revenue, Anti Corruption Bureau, Public Health, BMC, Education, Water Resources, Agriculture, Women & Child welfare, Industries, Information & Technology, Police, Sales Tax and Transport. Deputy Chief officer of Mumbai Region, Abhimanyu Kale, DCP Sunil Ramanand, Private Secretary to MOS -Housing, Kailash Pahare, Deputy Secretary (Housing) & Additional Collector Dilip Shinde are the 4 promoters of the Society. While A.M. Wajarkar, Additional Collector of SRA is the chief promoter.

Thursday, 6 April 2017

हजारों करोड़ की जमीन टाटा को 54 करोड़ में 

राज्य का कोई मंत्री नियमों की धज्जियां उड़ाकर फैसला सुनाता हैं तो निश्चित तौर राज्य के लिए घाटे का ही सौदा होता हैं। कांग्रेस के राज में राजस्व मंत्री बालासाहेब थोरात ने सत्ता जाते जाते मागाठाणे स्थित 32,182.20 चौरस मीटर की अधिग्रहित जमीन जो नियमानुसार सरकार को मिल सकती थी और उसकी बाजार की किंमत हजारों करोड़ हैं उसे टाटा स्टील कंपनी को कौड़ियों के दाम यानी 54 करोड़ में  यूं ही भेंट कर दी। इसका खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से पूर्व राजस्व मंत्री का अव्यावहारिक फैसला रद्द करने की मांग की हैं। यह एक स्पष्ट उदाहरण है जिससे पता चलता है कि गरीबों से अधिग्रहण के नाम पर ज़मीन लेकर उसे धनिकों को कैसे दी जाती है. संपादन की हुई ज़मीन पर सरकारी आवास बनने चाहिए उसकी जगह पर हाई एन्ड लक्ज़री अपार्टमेन्ट बन रहे है.

आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली को मुंबई उपनगर जिला कार्यालय से इस जमीन से जुड़े हुए दस्तावेज प्राप्त हुए हैं। दस्तावेज के अनुसार दिनांक 30 जनवरी 1969 को सरकार ने अधिग्रहण कानून के अंतर्गत स्पेशल स्टील लिमिटेड इस कंपनी को गोडाऊन का विस्तार और कामगारों के निवास के लिए 32,182.20 चौरस मीटर जमीन अधिग्रहण कर दी। कुछ साल के बाद स्पेशल स्टील को टेकओवर करनेवाली टाटा कंपनी ने जमीन का कुछ हिस्सा निजी बिल्डर को बेच दिया।  सरकार और कंपनी में हुई सनद की शर्त नंबर 6 के अनुसार कंपनी को अधिग्रहित कर दी गई जमीन पर किसी भी तरह का  हस्तांतरण करने के पहले सरकार से पूर्व अनुमति लेना अनिर्वाय हैं।  साथ ही में सनद की शर्त नंबर 3 अ के अनुसार सनद  की किसी भी शर्त या नियम का उल्लंघन किया तो कंपनी को किए जमीन का हस्तांतरण रद्द होगा और सारी जमीन सरकार को जमा की जाएगी। 

टाटा स्टील कंपनी ने वर्ष 2001 में अधिग्रहित जमीन से 3,051.80 चौरस मीटर इतनी जमीन बिल्डर को वाणिज्य और निवास के इस्तेमाल के लिए बिना सरकारी इजाजत देने का अवैध काम किया। सनद की शर्त और नियम का उल्लंघन करने के बाद कंपनी ने कारवाई के डर से जमीन हस्तांतरण को मंजूरी के लिए जिलाधिकारी, मुंबई उपनगर से अनुरोध किया जिस प्रस्ताव को सरकार के पास भेजा गया।  सरकार ने विभिन्न विकल्प पर गौर फरमाते हुए सारी जमीन सरकार को वापस लौटाने का विकल्प रखते हुए टाटा की हवा निकाल दी थी। बाद में मामला टाटा के पक्ष में होने से टाटा कंपनी ने जिस बिल्डर मेसर्स इक्लाईन रियल्टी प्रा.लिमिटेड को जमीन हस्तांतरित की थी उस बिल्डर ने जमीन की अनार्जित रकम 8 करोड़ 40 लाख 14 हजार 371 रुपए अदा कर दी । सरकारी बल मिलते ही टाटा कंपनी नेे वर्ष 2014 में अधिग्रहित जमीन की शेष बची  29,130.40 चौरस मीटर जमिन का क्षेत्र वाणिज्य और निवास प्रयोजन के लिए विक्री से हस्तांतरित करने के लिए आवेदन किया। जबकि  दिनांक 6 अगस्त 2014 को सरकार की अधिग्रहण समिति की बैठक में मूल प्रयोजन से विभिन्न प्रयोजन होने से टाटा कंपनी के हस्तांतरण प्रस्ताव को ख़ारिज करने का निर्णय लिया गया था जिसे राजस्व मंत्री के तौर खुद थोरात ने मंजूरी भी दी। इस आदेश के बाद 44 करोड़ 98 लाख 40 हजार 63 इतनी रकम अदा की हैं।

पहले जमीन हस्तांतरण को विरोध कर पूरी की पूरी जमीन को सरकार को वापस लौटाने पर सहमत हुए राजस्व मंत्री बालासाहेब थोरात ने बाद में टाटा कंपनी के पैरोकार बने। सरकार के हित को नजर अंदाज कर टाटा स्टील कंपनी और बिल्डर लॉबी को आर्थिक लाभ कराने के गलत मकसद से अधिग्रहण समिति के निर्णय को पहले मंजूरी दी थी उसे रद्द करते सरकार को हजारों करोड़ों की चपत लगाई। टाटा स्टील लिमिटेड इस कंपनी ने सनद का उल्लंघन किया जिसे राजस्व मंत्री बालासाहेब थोरात ने पद का दुरुप्रयोग कर सरकार को करोड़ों की लगाई चपत के मद्देनजर जमीन हस्तांतरण आदेश रद्द करने तथा उस जमीन को कब्जे में लेकर आम लोगों को सहूलियत वाले मकान बनाने की मांग अनिल गलगली ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को लिखे पत्र में की हैं।  

कलेक्टर और भू संपादन विभाग ने सरकार को ज़मीन वापस ले लेने का सुझाव दिया जो सरकार ने ख़ारीज कर दिया। सरकार ने टाटा कंपनी पर मेहरबानी की। इससे सरकार को हज़ारों करोड़ का चुना लगा.नई सरकार में राजस्व मंत्री एकनाथ खडसे ने 21 नवंबर 2014 को आदेश जारी कर इसे चुनाव पूर्व का निर्णय बताते हुए पुनर्विलोकन के तहत आगे कार्यवाही करने का आदेश दिया और 20 फरवरी 2015 को विभागीय आयुक्त, कोकण विभाग ने सुनवाई रखी जिसका आगे का ब्यौरा सरकारी रिकॉर्ड में नहीं हैं। यानी नई सरकार ने भी इसे गलत करार देते हुए कारवाई सुरु कर दी थी।  इस जमीन पर फिलहाल ओबेरॉय स्काय गार्डन का काम सुरु हैं, इसे ताबडतोब रोकने और पुरे मामले की पुनः जांच करने की मांग अनिल गलगली ने की हैं। 

हजारों कोटींची जमीन टाटा कंपनीला फक्त 54 कोटीत

राज्यातील कोणताही मंत्री जेव्हा नियमांची पायमल्ली करत निर्णय घेतो तेव्हा निश्चितपणाने राज्यासाठी तो सौदा नुकसानीचा ठरतो. कांग्रेसच्या राजवटीत महसूल मंत्री बाळासाहेब थोरात यांनी सत्ता जाता जाता मागाठाणे येथील 32,182.20 वर्ग मीटरची भूसंपादित केलेली जमीन जी नियमानुसार सरकारच्या ताब्यात येऊ शकली असती. ज्या जमिनीचे बाजार मूल्य हजारों कोटीच्या आसपास आहे ती जमिन टाटा स्टील कंपनीला अल्प दरात म्हणजे फक्त 54 कोटीत अशीच भेट दिली. याबाबीचा खुलासा आरटीआय कार्यकर्ते अनिल गलगली यांनी  करत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांना माजी महसूल मंत्री यांच्या अव्यावहारिक निर्णयास रद्द करण्याची मागणी केली आहे. हे एक स्पष्ट उदाहरण आहे ज्यावरुन लक्षात येते की गरीबांची भूसंपादानाच्या नावावर जमीन घेत त्यास श्रीमंताना कशी दिली जाते.संपादन केलेल्या जमिनीवर सरकारी घरे बनविली गेली पाहिजेत पण त्या जमिनीवर बनत आहे हाय अँड लक्जरी अपार्टमेंट बनत आहे.

आरटीआय कार्यकर्ता अनिल गलगली यांस मुंबई उपनगर जिल्हाधिकारी कार्यालयाकडून या जमिनीच्या संबंधित कागदपत्रे प्राप्त झाली आहेत. या कागदपत्रांच्या अनुसरुन दिनांक 30 जानेवरी 1969 ला सरकारने भूसंपादन कायदा अंतर्गत स्पेशल स्टील लिमिटेड या कंपनीस गोडाऊन विस्तार आणि कामगारांच्या निवासासाठी 32,182.20 चौरस मीटर जमीन भूसंपादित केली. काही वर्षानंतर स्पेशल स्टील कंपनीस टेकओवर करणा-या टाटा कंपनीने जमीनीचा काही भाग खाजगी विकासकास विकला. सरकार आणि कंपनी में झालेल्या सनद मधील अट क्रमांक 6 च्या अनुसार कंपनीला भूसंपादित करत दिली गेलेली जमिनीवर कोणत्याही प्रकारचे हस्तांतरण करण्यापूर्वी सरकारचीे पूर्व परवानगी घेणे बंधनकारक होती. त्याचबरोबर सनद मधील अट क्रमांक 3 अ च्या अनुसार सनद मधील कोणत्याही अटीचा किंवा नियमाचा  उल्लंघन केल्यास कंपनीला दिली गेलेल्या जमीनीचे हस्तांतरण रद्द होणार आणि सर्व जमीन सरकारच्या ताब्यात दिली जाईल.

टाटा स्टील कंपनीने 2001साली भूसंपादित जमिनीपैकी 3,051.80 चौरस मीटर इतकी जमीन एका बिल्डर यास वाणिज्य आणि निवासाच्या वापरासाठी विना सरकारी परवानगी देण्याचे अनधिकृत काम केले. सनद मधील अट आणि नियमाचे उल्लंघन केल्यानंतर कंपनीने कार्यवाहीच्या भीतीपोटी जमीन हस्तांतरणाची परवानगी जिल्हाधिकारी, मुंबई उपनगर यांस कडे मागितली. या प्रस्तावास सरकारकडे पाठविले असता शासनाने विविध पर्यायाचा विचार करत सर्व जमीन शासनास परत देण्याचा पर्याय सुचविला आणि टाटा कंपनीस आश्चर्याचा धक्का दिला. त्यानंतर प्रकरण टाटांच्या बाजूने मंत्री महोदयांनी करताच ताबडतोब हस्तांतरित जमीनीची अनार्जित रक्क्म 8 कोटी 40 लाख 14 हजार 371 रुपये अदा केली. टाटा कंपनीनेे 2014 साली भूसंपादित जमीनपैकी शिल्लक राहिलेली  29,130.40 चौरस मीटर जमीन वाणिज्य आणि निवास प्रयोजनासाठी विक्रीने हस्तांतरण करण्याची विनंती केले होती. दिनांक 6 ऑगस्ट 2014 रोजी शासनाच्या भूसंपादन समितीच्या बैठकीत मूळ प्रयोजनाच्या पेक्षा वेगळे प्रयोजन असल्यामुळे टाटा कंपनीच्या हस्तांतरण प्रस्तावास फेटाळण्याचा निर्णय घेण्यात आला होता त्यास महसूल मंत्री असलेल्या थोरात यांनी सुद्धा मान्यता दिली होती. या आदेशानंतर 44 कोटी 98 लाख 40 हजार 63 इतकी रक्कम अदा केली.

सर्वप्रथम जमीन हस्तांतरणास विरोध करत संपूर्ण जमीन शासनाच्या ताब्यात देण्याच्या प्रस्ताव प्रकरणात सहमत झालेले महसूल मंत्री बाळासाहेब थोरात हे त्यानंतर टाटा कंपनीचे प्रवक्ते बनले. शासनाचे हित लक्षात न घेता टाटा स्टील कंपनी आणि बिल्डर लॉबीस आर्थिक लाभ करुन देण्यासाठी भूसंपादन समितीच्या निर्णयास प्रथम मंजूरी दिली होती त्यास रद्द करते शासनाचे प्रचंड नुकसान केले. टाटा स्टील लिमिटेड या कंपनीने सनदचे उल्लंघन केले ज्यास महसूल मंत्री असलेल्या बाळासाहेब थोरात यांनी पदाचा दुरुप्रयोग करत शासनाला हजारों कोट्यावधीचा चूना लावला आहे, ही बाब लक्षात घेता जमीन हस्तांतरण आदेश रद्द करणे आणि ती जमीन ताब्यात घेत सामान्य जणांसाठी कब्जे किफायतशीर घरे बांधण्याची मागणी अनिल गलगली यांनी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांस लिहिलेल्या पत्रात केली आहे. जिल्हाधिकारी आणि भूसंपादन समितिने शासनाला जमीन परत घेण्याचा दिलेला सल्ला शासनाने धुडकावित टाटा कंपनीवर मेहरबानी केली. यामुळे शासनाला कोटयावधीचा नुकसान झाले. नवीन शासनात महसूल मंत्री एकनाथ खडसे यांनी 21 नोव्हेंबर 2014 ला आदेश जारी करत यास निवडणुकीपूर्वीचा घेतलेला घाईचा निर्णय सांगत पुनर्विलोकनासाठी पुढची कार्यवाही करण्याचे आदेश दिले आणि 20 फेब्रुवारी 2015 ला विभागीय आयुक्त, कोकण विभाग यांनी सुनावणी आयोजित केली ज्याची पुढील कोणतीही माहिती अभिलेखावर उपलब्ध नाही.  नवीन शासनाने सुद्धा यास चुकीचा निर्णय असल्याचा दावा करत कार्यवाही सुरु केली होती.  या जमीनीवर सद्या ओबेरॉय स्काय गार्डनचे काम सुरु आहे. ज्यास ताबडतोब रोखण्याची आणि संपूर्ण प्रकरणाची चौकशी करण्याची मागणी अनिल गलगली यांनी केली आहे.

Tata Steel got Government land at throw away price

It leads to huge loss to exchequer if any Minister takes decision overseeing rules and regulations. Something similar was done by Revenue Minister Mr. Balasaheb Thorat of previous Congress government. During final days of his tenure he gifted 32,182.20 Sq.Km of acquired land at Magathane to Tata Steel Company at very low price, which could have been given to government. This disclosure came through of RTI activist Anil Galgali who requested Chief Minister to cancel this decision. This is a good example of how land acquired from poor people is given to rich. This acquired land could have been used for Public housing but now it will be used for construction of high end luxury apartments.

RTI activist Anil Galgali has got documents related to this land from Mumbai Suburban district office. According to documents on 30th January 1969 government acquired 32,182.20 Sq Kms of land as per Land Acquisition act for extending godown and making residential quarters for laborers of Special Steel Limited. After few Tata steel took over Special Steel and sold a part of the land to private builder. As per the clause 6 of agreement between Government and the Company, before handing over the land to any other party it is mandatory to take permission of government. Also as per Clause 3A of the agreement, the acquired land has to be handed over to government in case there is violation of any rules and regulations. 

Tata Steel company in year 2001, gave acquired land of 3,051.80 Sq Kms of land to Builders to develop the land for commercial and residential purposes without informing government nor any permission. After violating the rules mentioned in agreement, company sent a request to Collector of Mumbai Suburban to approve this transfer of land. Looking after multiple options, Government told Tata Steel to return the land back to Government. Later when ruling went on their side &  8 Crores 40 lakhs 14 thousant and 371 rupees deposited as unearning income. After getting help from Bureaucrats, Tata Company applied for transfer of the remaining acquired land of 29,130.40 Sq.kms for commercial and residential development of land. This was in spite of the fact that Government Committee for Land acquisition had decided to reject any proposal from Tata Company that requests for transfer of land for any purpose except for the purpose decided in the beginning, which was approved by Revenue Minister Mr. Thorat himself. After this order Said company paid 44 cr 98 lakh 40 Thousand and 63 Rupees to Government. 

Initially Mr. Thorat opposed the illegal transfer of land by Tata Company but now he supports Tatas. Ignoring the interests of Government he rejected the decision taken by Land Acquisition Committee leading to heavy loss to government to the tune of thousands of crores. Tata Steel company violated the rules of the agreement and Mr Thorat misused his position to huge loss. In view of this Anil Galgali has requested Chief Minister Devendra Fadnavis to reject this transfer of land by Tata Company and make government take over the control of land to build affordable housing for common public. If Government had allowed in 2014 then there is no proof that company had paid fees for Change of User for this land. This makes it clear that without paying any fees to government the land is being commercially developed which is illegal. Collector and Land records department had given proposal to take over the land which was rejected by Government which lead to huge loss to government. In a new govt Former Revenue Minister Eknath Khadse on 21st Nov 2014 issue a order which said that this decision was taken in prior to election and in hurry thus he sent it further to reconsideration. On 20 Feb 2015 Konkan Divisional Commissioner put a up hearing of which no further information is available in records. Even new govt termed it as wrong decision. Anil Galgali has demanded a detail probe in this and stay on ongoing construction at site.