Wednesday, 24 June 2026

Maharashtra RTI Rules 2026: Reform or a New Question on Transparency?

Maharashtra RTI Rules 2026: Reform or a New Question on Transparency?

Were these controversial changes really necessary?

The Right to Information (RTI) is not merely a law; it is one of the most significant democratic tools that enables citizens to seek accountability from the government. The Right to Information Act, 2005, introduced by the Government of India, was designed to promote transparency, improve governance and strengthen public participation.

While states were empowered to frame procedural rules within their jurisdiction, such rules were expected to remain aligned with the spirit and objectives of the parent legislation. Against this backdrop, the Government of Maharashtra announced a set of amendments to its RTI rules on 12 June 2026, triggering widespread public discussion and debate.

The revised framework reportedly introduced provisions relating to higher fees, disclosure of purpose for seeking information, proof of citizenship requirements, restrictions concerning legal representation, and additional procedural conditions. The issue, however, is not only about what was changed but also how those changes were introduced.

When laws or rules that directly affect citizens are modified, public consultation, stakeholder engagement, and publication of draft proposals are generally regarded as important elements of good governance. Therefore, questions naturally emerged: Was there adequate consultation? Were citizen groups, RTI users, or institutional stakeholders sufficiently involved before implementation?

This is not the first time RTI-related procedural changes have generated public debate in Maharashtra. In 2012, during the tenure of then Chief Minister Prithviraj Chavan, a proposal introducing a 150-word limit on RTI applications had attracted opposition from RTI activists and civil society groups. The matter subsequently entered legal scrutiny. In that context, the return of procedural restrictions after many years revived concerns among transparency advocates.

Among the recent amendments, the most debated provision was the requirement that applicants disclose the purpose for seeking information. One of the long-standing principles associated with RTI practice has been that citizens should ordinarily not be required to justify why information is being requested. Consequently, the proposal invited strong reactions from several quarters.

Significantly, on 19 June 2026, the government withdrew the requirement relating to disclosure of purpose. That reversal within seven days raised further questions. If the provision was necessary, why was it withdrawn so quickly? If it was unnecessary, why was it introduced in the first place? Was sufficient legal and administrative review undertaken before notification?

During this period, discussions also intensified following public objections and reported protest warnings from senior social activist Anna Hazare.
However, an equally important issue often receives less attention.

Under Section 4(1)(b) of the RTI Act, 2005, public authorities are expected to proactively disclose key categories of information. Effective implementation of proactive disclosure could significantly reduce the need for citizens to file RTI applications.

This leads to broader governance questions. How many public authorities have fully implemented proactive disclosure obligations? How effective is record management? Are reasons for policy decisions being consistently documented and communicated?Has accountability been fixed where disclosure obligations were ignored?

At the same time, it may also be useful to evaluate the relationship between the Maharashtra State Information Commission and the government. If institutional coordination exists, an independent review could examine. How many recommendations were made by the Commission? How many were accepted by the state government? How many resulted in actual implementation?

The long-term strength of the RTI framework will not come from increasing procedural barriers but from improving transparency, strengthening records management, and expanding proactive disclosure. In a democracy, citizens seeking information should not be viewed as an administrative burden, but as participants in better governance.

Anil Galgali 
RTI Activist

महाराष्ट्र सूचना का अधिकार नियम 2026 : सुधार या पारदर्शिता पर नया प्रश्न?

महाराष्ट्र सूचना का अधिकार नियम 2026 : सुधार या पारदर्शिता पर नया प्रश्न?

क्या वास्तव में इतने विवादास्पद बदलावों की आवश्यकता थी?

सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों को शासन से जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रभावी माध्यम है। शासन के कार्यों में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नागरिक सहभागिता बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लागू किया। राज्यों को अपने प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के अनुसार नियम बनाने की स्वतंत्रता दी गई, लेकिन यह अपेक्षा भी रखी गई कि नियम कानून की मूल भावना के अनुरूप हों।

इसी पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र सरकार ने 12 जून 2026 को सूचना अधिकार नियमों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव घोषित किए। सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से जारी इन संशोधनों ने नागरिकों, सूचना कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के बीच व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

इन बदलावों में शुल्क वृद्धि, सूचना मांगने का प्रयोजन बताने की शर्त, नागरिकता का प्रमाण, वकीलों की भूमिका पर सीमाएं तथा आवेदन प्रक्रिया में अतिरिक्त औपचारिकताएं जैसे प्रावधान शामिल थे। शासन की दृष्टि से इनका उद्देश्य प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना हो सकता है, लेकिन अनेक लोगों ने इसे सूचना तक पहुंच को जटिल बनाने वाला कदम माना।

सबसे बड़ा प्रश्न बदलावों की सामग्री नहीं, बल्कि उनकी प्रक्रिया को लेकर उठाया गया। सार्वजनिक हित से जुड़े कानूनों या नियमों में परिवर्तन करते समय सामान्यतः मसौदा सार्वजनिक किया जाता है, नागरिकों और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे जाते हैं तथा व्यापक चर्चा की जाती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इन बदलावों से पहले पर्याप्त सार्वजनिक परामर्श किया गया था?

यह पहली बार नहीं है जब सूचना अधिकार व्यवस्था में ऐसे प्रश्न उठे हों। इससे पहले 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के कार्यकाल में RTI आवेदन के लिए 150 शब्दों की सीमा का विषय चर्चा में आया था। उस समय सूचना कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया और मामला न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचा। ऐसे में वर्षों बाद फिर आवेदन प्रक्रिया को सीमित करने जैसे कदमों की चर्चा ने पुराने विवादों को पुनः सामने ला दिया।

नए नियमों में सबसे अधिक विवाद सूचना मांगने का प्रयोजन बताने की शर्त को लेकर हुआ। सूचना का अधिकार अधिनियम की मूल भावना यह रही है कि नागरिक को जानकारी मांगने का कारण बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। यही कारण है कि इस प्रावधान को लेकर व्यापक आपत्तियां सामने आईं।

विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात यह रही कि 19 जून 2026 को सरकार ने सूचना के प्रयोजन वाली शर्त वापस ले ली। मात्र सात दिनों में निर्णय बदलने से कई प्रश्न उठे यदि यह शर्त आवश्यक थी तो वापस क्यों ली गई? और यदि आवश्यक नहीं थी तो प्रारंभ में जोड़ी क्यों गई? इस बीच वरिष्ठ समाजसेवी अण्णा हजारे द्वारा विरोध और आंदोलन की चेतावनी के बाद इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर गतिविधियां तेज होने की चर्चा भी सामने आई।

हालांकि इस पूरे विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाता है। सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4(1)(ख) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरणों को अनेक प्रकार की सूचनाएं स्वयं प्रकाशित करनी होती हैं। यदि इस व्यवस्था का प्रभावी पालन किया जाए तो नागरिकों को बार-बार आवेदन करने की आवश्यकता ही कम हो सकती है।

इसलिए चर्चा केवल नए नियमों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी समीक्षा का विषय होना चाहिए कि कितने विभागों ने स्वप्रेरित सूचना प्रकटीकरण लागू किया? अभिलेख प्रबंधन कितना प्रभावी है? नीति निर्णयों के कारण सार्वजनिक करने में कितनी प्रगति हुई? लापरवाही के मामलों में कितनी जवाबदेही तय की गई? इसके साथ ही यह भी मूल्यांकन होना चाहिए कि महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग द्वारा समय-समय पर दी गई सिफारिशों में से कितनी सरकार ने स्वीकार कीं और उनमें से कितनी वास्तव में लागू हुईं।

सूचना अधिकार व्यवस्था की मजबूती अधिक शर्तें लगाने से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रशासन, बेहतर अभिलेख व्यवस्था और नागरिकों को समय पर सूचना उपलब्ध कराने से आएगी। लोकतंत्र में सूचना मांगने वाला नागरिक बाधा नहीं, बल्कि सुशासन का सहभागी होता है।

अनिल गलगली 
सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

महाराष्ट्र माहिती अधिकार नियम 2026 : बदल की पारदर्शकतेवर प्रश्न?

महाराष्ट्र माहिती अधिकार नियम 2026 : बदल की पारदर्शकतेवर प्रश्न?

माहिती अधिकार अधिक सक्षम होणार की अधिक गुंतागुंतीचा?

माहितीचा अधिकार हा लोकशाहीतील नागरिकांचा एक महत्त्वाचा हक्क मानला जातो. शासनाच्या कामकाजात पारदर्शकता, उत्तरदायित्व आणि नागरिकांचा सहभाग वाढविण्यासाठी केंद्र शासनाने माहितीचा अधिकार अधिनियम, 2005 लागू केला. या कायद्यामुळे नागरिकांना शासनाकडे माहिती मागण्याचा वैधानिक अधिकार प्राप्त झाला.

राज्य शासनांना त्यांच्या प्रशासकीय कार्यपद्धतीनुसार नियम तयार करण्याचा अधिकार असला तरी त्या नियमांचा मूळ कायद्याच्या उद्देशाशी सुसंगत असणे अपेक्षित असते. याच पार्श्वभूमीवर महाराष्ट्र शासनाने 12 जून 2026 रोजी माहिती अधिकार नियमांमध्ये काही महत्त्वपूर्ण बदल जाहीर केले आणि त्यावरून राज्यभर चर्चा सुरू झाली.

नवीन नियमांमध्ये शुल्कवाढ, माहिती मागण्याचे प्रयोजन नमूद करणे, नागरिकत्वाचा पुरावा, काही प्रक्रियात्मक निर्बंध अशा अनेक बाबींचा समावेश करण्यात आला. शासनाच्या मते यामागे प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित करणे हा उद्देश असू शकतो; मात्र अनेक माहिती कार्यकर्ते आणि नागरिकांनी या बदलांबाबत गंभीर आक्षेप नोंदविले.

मुख्य प्रश्न बदलांचा नसून ते कसे आणि कोणत्या प्रक्रियेतून करण्यात आले याचा आहे. सार्वजनिक हिताशी संबंधित नियम बदलताना सामान्यतः संबंधित घटकांची मते मागविणे, मसुदा सार्वजनिक करणे आणि व्यापक चर्चा करणे ही सुशासनाची अपेक्षित पद्धत मानली जाते. त्यामुळे प्रश्न उपस्थित झाला की या बदलांपूर्वी पुरेसा लोकसहभाग झाला होता का?

यापूर्वी 2012 मध्ये तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यांच्या कार्यकाळात माहिती अर्जासाठी 150 शब्दांची मर्यादा प्रस्तावित करण्यात आली होती. त्यावेळी माहिती कार्यकर्त्यांनी त्याला विरोध केला आणि संबंधित विषय न्यायालयीन प्रक्रियेत गेला. अशा परिस्थितीत अनेक वर्षांनंतर पुन्हा अर्ज प्रक्रियेला अतिरिक्त अटी जोडण्याचा प्रयत्न का करण्यात आला, अशी चर्चा सुरू झाली.

नवीन नियमांमधील सर्वाधिक चर्चेत राहिलेली बाब म्हणजे माहिती मागण्याचे प्रयोजन नमूद करण्याची अट. माहिती अधिकाराच्या मूलभूत तत्त्वांनुसार नागरिकाने माहिती का मागितली हे विचारले जाणार नाही, अशी भूमिका अनेकदा मांडली गेली आहे. त्यामुळे ही अट समाविष्ट झाल्यानंतर नागरिक व सामाजिक संघटनांनी प्रश्न उपस्थित केले.
विशेष म्हणजे, 19 जून 2026 रोजी शासनाने माहितीचे प्रयोजन नमूद करण्याची अट मागे घेतली. अवघ्या सात दिवसांत झालेल्या या निर्णयबदलामुळे अनेक प्रश्न निर्माण झाले. जर अट आवश्यक होती तर ती मागे का घेण्यात आली? आणि जर ती आवश्यक नव्हती, तर ती समाविष्ट करण्याची गरज काय होती?

दरम्यान, ज्येष्ठ समाजसेवक अण्णा हजारे यांनी या विषयावर आंदोलनाचा इशारा दिल्यानंतर शासनस्तरावर हालचाली वाढल्याचे दिसून आले. मात्र या चर्चेत आणखी एक मूलभूत मुद्दा अनेकदा दुर्लक्षित राहतो. माहिती अधिकार कायद्याच्या कलम 4(1)(ब) नुसार सार्वजनिक प्राधिकरणांनी अनेक प्रकारची माहिती स्वयंस्फूर्तीने प्रसिद्ध करणे अपेक्षित आहे. जर ही तरतूद प्रभावीपणे अंमलात आली असती तर नागरिकांना मोठ्या प्रमाणात स्वतंत्र माहिती अर्ज करण्याची गरजच कमी झाली असती.

म्हणूनच प्रश्न केवळ नवीन नियमांचा नाही. प्रश्न असा आहे की शासनाने आधी अस्तित्वातील जबाबदाऱ्या कितपत पूर्ण केल्या आहेत? तसेच महाराष्ट्र राज्य माहिती आयोगाने वेळोवेळी केलेल्या शिफारशींपैकी किती शासनाने स्वीकारल्या आणि किती प्रत्यक्षात अंमलात आणल्या याचे स्वतंत्र मूल्यमापन होणे आवश्यक आहे.

माहिती अधिकार व्यवस्थेचे खरे बळ हे अर्जांवरील निर्बंधांमध्ये नसून पारदर्शक प्रशासन, सक्षम अभिलेख व्यवस्थापन आणि स्वयंस्फूर्त माहिती प्रकटनात आहे. आज गरज आहे ती माहिती मिळवणे कठीण करण्याची नव्हे, तर शासन अधिक खुले आणि उत्तरदायी बनवण्याची.

अनिल गलगली 
माहिती अधिकार कार्यकर्ते

Tuesday, 23 June 2026

“एक शाम आर्थर जेल के कैदियों के नाम” नारी सम्मान संगठन की अनोखी पहल

“एक शाम आर्थर जेल के कैदियों के नाम” नारी सम्मान संगठन की अनोखी पहल

संगीत, हास्य और संवेदना के माध्यम से कैदियों तक पहुंचा मानवीय संदेश

समाज में सकारात्मक परिवर्तन और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने की दिशा में एक अनोखी पहल करते हुए नारी सम्मान संगठन की प्रमुख डॉ. सुंदरी ठाकुर द्वारा “एक शाम आर्थर जेल के कैदियों के नाम” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य जेल में अपनी सजा काट रहे कैदियों तक संवेदना, सकारात्मक सोच और सामाजिक पुनर्संवाद का संदेश पहुंचाना था।

कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, परिवर्तन और आत्मविश्वास के अवसर हमेशा बने रहते हैं। कला, संगीत और संवाद के जरिए कैदियों के भीतर सकारात्मक ऊर्जा और आत्मचिंतन का वातावरण बनाने का प्रयास किया गया।

इस अवसर पर अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्तित्वों ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई। कार्यक्रम में डॉ. विनय सिंह, प्रसिद्ध कॉमेडियन संजय शर्मा, गायक मिकी नरूला, गायिका चंचल लहरी, आल्फिया सिंगर, सोनी सिंगर सहित अन्य कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से कार्यक्रम को यादगार बनाया।

इसके अतिरिक्त प्रणाली शाह, पूनम छाबड़िया, रूपल जौहरी, धर्मेश सिंह एवं उनकी टीम ने कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कार्यक्रम के दौरान कलाकारों ने संगीत, हास्य और प्रेरणादायक संवादों के माध्यम से उपस्थित कैदियों के साथ भावनात्मक जुड़ाव स्थापित किया। आयोजन का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समाज के हर वर्ग तक मानवीय संवेदनाओं और सकारात्मक सोच को पहुंचाना था।

नारी सम्मान संगठन की प्रमुख डॉ. सुंदरी ठाकुर ने कहा कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति परिवर्तन और नई शुरुआत का अवसर पाने का अधिकारी है। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज और संवेदनाओं के बीच एक सकारात्मक सेतु का कार्य करते हैं।

यह आयोजन सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनशीलता और पुनर्वास की भावना को समर्पित रहा।

शांतिकुंज में गायत्री जयंती महापर्व से पूर्व निकाली गई भव्य दीप रैली

शांतिकुंज में गायत्री जयंती महापर्व से पूर्व निकाली गई भव्य दीप रैली

जीवन संग्राम का नाम अध्यात्म : डॉ. चिन्मय पण्ड्या

सच्ची उपासना मानव सेवा और सदाचार में निहित : शैफाली पण्ड्या

हरिद्वार स्थित गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में गायत्री जयंती महापर्व की पूर्व संध्या पर जन-जागरण एवं आत्मिक उन्नति के विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस अवसर पर आयोजित भव्य दीप रैली का नेतृत्व अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि डॉ. चिन्मय पण्ड्या तथा महिला मंडल प्रमुख श्रीमती शैफाली पण्ड्या ने मशाल एवं दीप प्रज्वलित कर किया।

सभा को संबोधित करते हुए देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि “जीवन के संग्राम का नाम अध्यात्म है।” उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में अनेक चुनौतियों, परिस्थितियों और आंतरिक द्वंद्वों का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में अध्यात्म ही वह शक्ति है, जो मनुष्य को स्थिरता, धैर्य और सही दिशा प्रदान करती है।

उन्होंने कहा कि जीवन की वास्तविकताओं को समझते हुए उनके बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। बाहरी संघर्षों के साथ-साथ मन के भीतर मौजूद इच्छाओं, क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकारों पर विजय प्राप्त करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अध्यात्म जीवन को श्रेष्ठ बनाने की कला है। आत्मसंयम, सद्विचार और सेवा भाव को अपनाकर ही व्यक्ति जीवन संग्राम में विजयी बन सकता है। उन्होंने जन्मशताब्दी वर्ष-2026 के अंतर्गत गायत्री परिवार द्वारा वैश्विक स्तर पर संचालित विभिन्न गतिविधियों की रूपरेखा भी प्रस्तुत की।

इससे पूर्व शांतिकुंज महिला मंडल प्रमुख श्रीमती शैफाली पण्ड्या ने कहा कि वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा ने अपने जीवन में गायत्री माता के करुणा, सेवा और मातृत्व के आदर्शों को साकार रूप दिया। उन्होंने अपने असीम प्रेम और आत्मीयता से संपूर्ण गायत्री परिवार को एक सूत्र में पिरोकर उसे संस्कारित एवं सशक्त परिवार का स्वरूप प्रदान किया।

उन्होंने कहा कि गायत्री माता ज्ञान, सद्बुद्धि और मानव कल्याण की प्रतीक हैं। वंदनीया माताजी ने इन्हीं आदर्शों के आधार पर नारी जागरण, संस्कार निर्माण और समाजोत्थान के कार्यों को नई दिशा दी। इस अवसर पर शांतिकुंज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों सहित देश-विदेश से आए हजारों साधक उपस्थित रहे।

शांतिकुंज मीडिया विभाग के अनुसार गायत्री जयंती महापर्व का मुख्य आयोजन बुधवार को होगा। इस दौरान अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुखद्वय का विशेष उद्बोधन होगा। साथ ही विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं के लिए गुरुदीक्षा एवं अन्य संस्कार निःशुल्क संपन्न कराए जाएंगे।

Tuesday, 16 June 2026

Inauguration of Vedvyas Flavy’s Pre-School Providing Free Education in Chandivali

Inauguration of Vedvyas Flavy’s Pre-School Providing Free Education in Chandivali

A new initiative to provide free education was launched with the inauguration of Vedvyas Flavy’s Pre-School at Safed Pul, Chandivali, Mumbai, through the efforts of Panchsheel Mahila Mandal. The school was inaugurated by RTI activist Anil Galgali. This social initiative was undertaken by Manali Subhash Gaikwad, while Subhash Gaikwad welcomed all dignitaries and citizens present at the event.

Speaking on the occasion, Anil Galgali stated that free and quality education is the foundation of overall social development and that such initiatives play an important role in bringing positive change to society.

The inauguration ceremony was attended by Educationist Ravi Nair, Adv. Amol Matele, Babu Batteli, Lawrence Baba D’Souza, Sunil Jain, Surya Gowda, Adv. Kailas Agawane, Krishna Nalawade, Ajay Shukla, Uttam Pokharkar, Hirachand Suryavanshi, Raju Sonawane, Rajendra Kamble, Jagnnath Udugade, Adv. Rehman, Banshi Singh, Aziz Khan, Mohsin Shaikh, Saeed Khan, Sarjerao Kamble, Ratnakar Shetty, Pushpendra Goswami, Pankaj Sharma, Pratik Prajapati, Swapnil Chavan, Ishwar Chand, Sandeep Pasalkar, Ram Sahu, Tausif Siddiqui, Dinanath Yadav, Shivaji Londhe, Datta Shelke, Rajshri Patil, Janhavi Dongre, Janhavi D’Souza, along with several other distinguished guests.


चांदिवली में निःशुल्क शिक्षा देने वाले वेदव्यास फ्लेवीज़ प्री स्कूल का शुभारंभ

चांदिवली में निःशुल्क शिक्षा देने वाले वेदव्यास फ्लेवीज़ प्री स्कूल का शुभारंभ

मुंबई के चांदिवली स्थित सफेद पुल परिसर में पंचशील महिला मंडल के माध्यम से निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने वाले वेदव्यास फ्लेवीज़ प्री स्कूल का शुभारंभ किया गया। इस स्कूल का उद्घाटन आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली के हस्ते संपन्न हुआ। इस उपक्रम की पहल मनाली सुभाष गायकवाड द्वारा की गई। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों एवं नागरिकों का स्वागत सुभाष गायकवाड ने किया।

इस अवसर पर शिक्षाविद रवि नायर, एड अमोल मातेले, बाबू बत्तेली, लॉरेंस बाबा डिसोझा, सुनील जैन, सूर्या गौडा, एड कैलास आगवणे, कृष्णा नलावडे, अजय शुक्ला, उत्तम पोखरकर, हिराचंद सूर्यवंशी, राजू सोनवणे, राजेंद्र कांबळे, जगन्नाथ उदूगडे, एड रेहमान, बंशी सिंह, अजीज खान, मोहसिन शेख, सईद खान, सर्जेराव कांबळे, रत्नाकर शेट्टी, पुष्पेंद्र गोस्वामी, पंकज शर्मा, प्रतीक प्रजापती, स्वप्निल चव्हाण, ईश्वर चंद, संदीप पासलकर, राम साहू, तौसिफ सिद्दीकी, दीनानाथ यादव, शिवाजी लोंढे, दत्ता शेळके, राजश्री पाटील, जान्हवी डोंगरे एवं जान्हवी डिसोझा सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।

इस अवसर पर अनिल गलगली ने कहा कि निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा समाज के सर्वांगीण विकास का आधार है तथा ऐसे उपक्रम समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।