Friday, 7 August 2026

भाषाई विदुषी थीं सुषमा स्वराज : राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा

भाषाई विदुषी थीं सुषमा स्वराज : राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा

‘अग्निशिखा सुषमा स्वराज’ के हिंदी संस्करण की प्रथम प्रति राज्यपाल को भेंट

मुंबई। देश की प्रखर राजनेता, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज एक अद्भुत भाषाई विदुषी थीं। उनका संपूर्ण जीवन महिला सशक्तीकरण, सेवा, समर्पण और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता का प्रेरणादायी उदाहरण है। उनके विचार, कार्यशैली और जनसेवा आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेंगी। यह उद्गार महाराष्ट्र के राज्यपाल महामहिम जिष्णु देव वर्मा ने मुंबई स्थित लोकभवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह में व्यक्त किए।

इस अवसर पर मुंबई भाजपा के उपाध्यक्ष, पूर्व राज्यमंत्री एवं वरिष्ठ भाजपा नेता अमरजीत मिश्र ने लेखिका मेधा किरीट सोमैया द्वारा लिखित मराठी पुस्तक ‘अग्निशिखा सुषमा स्वराज’ के अपने हिंदी अनुवाद की प्रथम प्रति राज्यपाल को भेंट की।

राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने कहा कि सुषमा स्वराज की भाषा अत्यंत संस्कृतनिष्ठ, प्रभावशाली और ओजस्वी थी। अपनी वाक्पटुता, भाषाई समृद्धता और विषयों पर गहरी पकड़ के कारण उन्होंने भारतीय राजनीति में एक विशिष्ट पहचान स्थापित की। उन्होंने कहा कि सुषमा स्वराज केवल एक सफल राजनेता ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं और भाषाई गौरव की सशक्त प्रतिनिधि थीं।

कार्यक्रम के दौरान लेखिका मेधा किरीट सोमैया ने सुषमा स्वराज के जीवन, संघर्ष, राजनीतिक यात्रा और सामाजिक योगदान पर प्रकाश डालते हुए उनके साथ जुड़े अनेक भावनात्मक संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा कि सुषमा स्वराज का संवेदनशील नेतृत्व, सहज व्यक्तित्व और जनसेवा का भाव आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है।

अमरजीत मिश्र ने अपने संबोधन में सुषमा स्वराज की अद्भुत भाषाई क्षमता, प्रभावशाली वक्तृत्व शैली और दूरदर्शी सोच का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति, भाषाओं और मूल्यों के प्रति उनका समर्पण असाधारण था। उन्होंने पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के नेतृत्व में मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में सहभागिता के अपने संस्मरण भी साझा किए।

राज्यपाल ने सुषमा स्वराज के संस्कृत ज्ञान का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि वे शिव तांडव स्तोत्र का अत्यंत प्रभावशाली पाठ करती थीं, जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं के प्रति उनके गहरे लगाव का परिचायक था। उन्होंने कहा कि संस्कृत का अध्ययन बचपन से विद्यालयों में कराया जाना चाहिए, क्योंकि बाल्यावस्था में अर्जित ज्ञान जीवनभर स्मरण रहता है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि आज भी उन्हें बचपन में सीखे गए संस्कृत के अनेक श्लोक और स्तोत्र कंठस्थ हैं।

राज्यपाल ने कहा कि शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार, चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण की आधारशिला भी है। भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है।

इस अवसर पर पूर्व सांसद किरीट सोमैया, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के पूर्व कार्याध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दुबे, पत्रकार विकास संघ के अध्यक्ष आनंद मिश्र, गायिका संजोली पांडेय, के. एस. मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार शैलेंद्र श्रीवास्तव, सुनील सिंह सहित साहित्य, राजनीति, शिक्षा और पत्रकारिता जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियां उपस्थित थीं।

समारोह में सुषमा स्वराज के जीवन-मूल्यों, उनके संघर्ष, महिला सशक्तीकरण के प्रयासों तथा समाज के प्रति उनके अमूल्य योगदान पर विस्तार से चर्चा हुई। साहित्य, संस्कृति, भाषा और प्रेरणा के इस संगम ने उपस्थित सभी लोगों को भावविभोर कर दिया। सुषमा स्वराज का व्यक्तित्व आज भी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणास्रोत है जो समाजसेवा, नेतृत्व और सकारात्मक परिवर्तन के पथ पर आगे बढ़ना चाहते हैं। विशेष रूप से महिलाओं के लिए उनका जीवन आत्मविश्वास, संघर्ष और सफलता का अनुपम उदाहरण है। 

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