Wednesday, 24 June 2026

महाराष्ट्र सूचना का अधिकार नियम 2026 : सुधार या पारदर्शिता पर नया प्रश्न?

महाराष्ट्र सूचना का अधिकार नियम 2026 : सुधार या पारदर्शिता पर नया प्रश्न?

क्या वास्तव में इतने विवादास्पद बदलावों की आवश्यकता थी?

सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिकों को शासन से जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रभावी माध्यम है। शासन के कार्यों में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नागरिक सहभागिता बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लागू किया। राज्यों को अपने प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र के अनुसार नियम बनाने की स्वतंत्रता दी गई, लेकिन यह अपेक्षा भी रखी गई कि नियम कानून की मूल भावना के अनुरूप हों।

इसी पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र सरकार ने 12 जून 2026 को सूचना अधिकार नियमों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव घोषित किए। सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से जारी इन संशोधनों ने नागरिकों, सूचना कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के बीच व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

इन बदलावों में शुल्क वृद्धि, सूचना मांगने का प्रयोजन बताने की शर्त, नागरिकता का प्रमाण, वकीलों की भूमिका पर सीमाएं तथा आवेदन प्रक्रिया में अतिरिक्त औपचारिकताएं जैसे प्रावधान शामिल थे। शासन की दृष्टि से इनका उद्देश्य प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना हो सकता है, लेकिन अनेक लोगों ने इसे सूचना तक पहुंच को जटिल बनाने वाला कदम माना।

सबसे बड़ा प्रश्न बदलावों की सामग्री नहीं, बल्कि उनकी प्रक्रिया को लेकर उठाया गया। सार्वजनिक हित से जुड़े कानूनों या नियमों में परिवर्तन करते समय सामान्यतः मसौदा सार्वजनिक किया जाता है, नागरिकों और संबंधित पक्षों से सुझाव मांगे जाते हैं तथा व्यापक चर्चा की जाती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या इन बदलावों से पहले पर्याप्त सार्वजनिक परामर्श किया गया था?

यह पहली बार नहीं है जब सूचना अधिकार व्यवस्था में ऐसे प्रश्न उठे हों। इससे पहले 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के कार्यकाल में RTI आवेदन के लिए 150 शब्दों की सीमा का विषय चर्चा में आया था। उस समय सूचना कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया और मामला न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचा। ऐसे में वर्षों बाद फिर आवेदन प्रक्रिया को सीमित करने जैसे कदमों की चर्चा ने पुराने विवादों को पुनः सामने ला दिया।

नए नियमों में सबसे अधिक विवाद सूचना मांगने का प्रयोजन बताने की शर्त को लेकर हुआ। सूचना का अधिकार अधिनियम की मूल भावना यह रही है कि नागरिक को जानकारी मांगने का कारण बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। यही कारण है कि इस प्रावधान को लेकर व्यापक आपत्तियां सामने आईं।

विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात यह रही कि 19 जून 2026 को सरकार ने सूचना के प्रयोजन वाली शर्त वापस ले ली। मात्र सात दिनों में निर्णय बदलने से कई प्रश्न उठे यदि यह शर्त आवश्यक थी तो वापस क्यों ली गई? और यदि आवश्यक नहीं थी तो प्रारंभ में जोड़ी क्यों गई? इस बीच वरिष्ठ समाजसेवी अण्णा हजारे द्वारा विरोध और आंदोलन की चेतावनी के बाद इस विषय पर प्रशासनिक स्तर पर गतिविधियां तेज होने की चर्चा भी सामने आई।

हालांकि इस पूरे विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाता है। सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4(1)(ख) के तहत सार्वजनिक प्राधिकरणों को अनेक प्रकार की सूचनाएं स्वयं प्रकाशित करनी होती हैं। यदि इस व्यवस्था का प्रभावी पालन किया जाए तो नागरिकों को बार-बार आवेदन करने की आवश्यकता ही कम हो सकती है।

इसलिए चर्चा केवल नए नियमों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी समीक्षा का विषय होना चाहिए कि कितने विभागों ने स्वप्रेरित सूचना प्रकटीकरण लागू किया? अभिलेख प्रबंधन कितना प्रभावी है? नीति निर्णयों के कारण सार्वजनिक करने में कितनी प्रगति हुई? लापरवाही के मामलों में कितनी जवाबदेही तय की गई? इसके साथ ही यह भी मूल्यांकन होना चाहिए कि महाराष्ट्र राज्य सूचना आयोग द्वारा समय-समय पर दी गई सिफारिशों में से कितनी सरकार ने स्वीकार कीं और उनमें से कितनी वास्तव में लागू हुईं।

सूचना अधिकार व्यवस्था की मजबूती अधिक शर्तें लगाने से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रशासन, बेहतर अभिलेख व्यवस्था और नागरिकों को समय पर सूचना उपलब्ध कराने से आएगी। लोकतंत्र में सूचना मांगने वाला नागरिक बाधा नहीं, बल्कि सुशासन का सहभागी होता है।

अनिल गलगली 
सूचना का अधिकार कार्यकर्ता

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