Wednesday, 14 January 2026

मुंबई में मतदान: क्या इस बार बदलेगी उदासीनता की तस्वीर?

मुंबई में मतदान: क्या इस बार बदलेगी उदासीनता की तस्वीर?


देश की आर्थिक राजधानी मुंबई एक बार फिर लोकतंत्र के सबसे अहम पड़ाव पर खड़ी है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव के लिए शहरभर में मतदान हो रहा है। करोड़ों मतदाताओं की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस बार मुंबईकर बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे या फिर पिछली तरह मतदान प्रतिशत सीमित ही रहेगा।


मुंबई जैसे महानगर में स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनाव हमेशा से एक विरोधाभास पेश करते रहे हैं। एक ओर यह देश की सबसे अमीर और प्रभावशाली महानगरपालिका है, वहीं दूसरी ओर यहां के नागरिकों की चुनावी भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है। व्यस्त जीवनशैली, नौकरी-धंधे का दबाव, लंबी यात्रा, मतदान को लेकर उदासीनता और “मेरे वोट से क्या फर्क पड़ेगा” जैसी मानसिकता इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं।

बीएमसी चुनाव और मतदान प्रतिशत का इतिहास

अगर पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह साफ दिखाई देता है कि मुंबई महानगरपालिका चुनावों में मतदान प्रतिशत लंबे समय तक 50 प्रतिशत से नीचे ही रहा।
बीएमसी चुनावों में मतदान प्रतिशत (1992–2017):
1992: 49.14%
1997: 44.36%
2002: 42.05%
2007: 46.05%
2012: 44.75%
2017: 55.28%

1997 से 2012 तक लगातार चार चुनावों में मतदान 42 से 46 प्रतिशत के बीच सिमटा रहा। यह दौर मुंबई के लिए सबसे कमजोर मतदाता भागीदारी वाला समय माना जाता है। लेकिन वर्ष 2017 में तस्वीर बदली और मतदान प्रतिशत बढ़कर 55.28% तक पहुंच गया, जो अब तक का सर्वाधिक रिकॉर्ड है।

2017 में क्यों टूटा रिकॉर्ड?

2017 का मनपा चुनाव कई मायनों में अलग था। उस समय राजनीतिक माहौल बेहद गर्म था और प्रमुख दलों के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला। स्थानीय मुद्दों जैसे खराब सड़कें, जलभराव, कचरा प्रबंधन, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं
इन सभी विषयों पर जोरदार बहस हुई। सोशल मीडिया, नागरिक समूहों और युवाओं की सक्रियता ने भी मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित किया। खासतौर पर पहली बार वोट देने वाले युवा और मध्यम वर्ग बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचे। यही कारण था कि 25 वर्षों में पहली बार बीएमसी चुनाव में मतदान 55 प्रतिशत के पार गया।

2026 का चुनाव: क्यों है खास?

इस बार का मनपा का चुनाव कई कारणों से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लगभग तीन वर्षों के अंतराल के बाद जनता को अपने स्थानीय प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिला है। अब तक नगर निगम प्रशासकीय व्यवस्था के तहत चल रहा था। नागरिकों में स्थानीय समस्याओं को लेकर असंतोष और अपेक्षाएं दोनों बढ़ी हैं।
राज्य चुनाव आयोग और प्रशासन ने भी इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास किए हैं। हाउसिंग सोसायटी में मतदान केंद्र, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों के लिए सुविधाएं, मतदाता जागरूकता अभियान और डिजिटल माध्यमों का उपयोग—ये सभी कदम इसी दिशा में उठाए गए हैं। चुनाव आयोग का स्पष्ट संदेश है कि मुंबई में इस बार 60 से 70 प्रतिशत मतदान का लक्ष्य रखा गया है।

लोकतंत्र की असली कसौटी: नागरिक सहभागिता

मुंबई महानगरपालिका केवल एक मनपा नहीं है, बल्कि यह देश की सबसे समृद्ध और प्रभावशाली स्थानीय स्वशासन संस्था है। शहर की सड़कें, अस्पताल, स्कूल, पानी की आपूर्ति, सफाई व्यवस्था और आपदा प्रबंधन सीधे इसी संस्था से जुड़े हैं। ऐसे में नगरसेवकों का चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मुंबई के भविष्य का फैसला है। कम मतदान का अर्थ है कि कुछ सीमित लोग पूरे शहर के लिए निर्णय करें। अधिक मतदान का अर्थ है कि जनता की मजबूत भागीदारी और जवाबदेह शासन।


15 जनवरी को होने वाला मतदान केवल एक तारीख नहीं, बल्कि मुंबईकरों के लिए एक अवसर है कि अपने शहर की दिशा तय करने का, अपने अधिकारों का प्रयोग करने का और लोकतंत्र को मजबूत बनाने का। यदि 2017 की तरह या उससे भी अधिक मतदान होता है, तो यह संकेत होगा कि मुंबई की जनता अब स्थानीय राजनीति को गंभीरता से ले रही है। उम्मीद है कि इस बार मुंबई न सिर्फ आर्थिक राजधानी के रूप में, बल्कि नागरिक जागरूकता के मामले में भी मिसाल पेश करेगी।

अनिल गलगली 
आरटीआई कार्यकर्ता

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